Monday, December 21, 2009

वो भी तो एक ज़माना था

अपना दिल भी दीवाना था
ख़्वाब को हमने सच माना था

उसका चेहरा एक हकीक़त
बाकी सब तो अफसाना था

अब समझे दुनिया का मतलब
रिश्तों का ताना बाना था

मेरा घर महफ़िल के सरीखा
छोड़ के सबको ही जाना था

भीड़ में रुसवा हमको किया
तन्हाई में समझाना था

उसका नाम भी ले ना पाए
होठों पर यूँ पैमाना था

फिर से वो पशोपेश में था
सच को फिर झुठलाना था

आँगन भर की जागीरदारी
वो भी तो एक ज़माना था

भूले हम सब प्यार के वादे
आखिर दिल को बहलाना था

"नज़र" की बातें कोई ना समझे
हाल-ए-दिल तो बतलाना था

3 Comments:

At December 21, 2009 at 10:38 PM , Blogger खुला सांड said...

वाह !! इस प्यारी रचना जो सच से से सरोबार है, तारीफ के लिए अल्फाज नहीं हैं, बधाई हो !!!

 
At January 1, 2010 at 3:00 AM , Blogger संगीता पुरी said...

इस नए ब्‍लॉग के साथ नए वर्ष में हिन्‍दी ब्‍लॉग जगत में आपका स्‍वागत है .. अच्‍छा लिखते हैं आप .. आपके और आपके परिवार वालों के लिए नववर्ष मंगलमय हो !!

 
At January 6, 2010 at 8:47 PM , Blogger अजय कुमार said...

हिंदी ब्लाग लेखन के लिये स्वागत और बधाई । अन्य ब्लागों को भी पढ़ें और अपनी बहुमूल्य टिप्पणियां देने का कष्ट करें

 

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