वो भी तो एक ज़माना था
अपना दिल भी दीवाना था
ख़्वाब को हमने सच माना था
उसका चेहरा एक हकीक़त
बाकी सब तो अफसाना था
अब समझे दुनिया का मतलब
रिश्तों का ताना बाना था
मेरा घर महफ़िल के सरीखा
छोड़ के सबको ही जाना था
भीड़ में रुसवा हमको किया
तन्हाई में समझाना था
उसका नाम भी ले ना पाए
होठों पर यूँ पैमाना था
फिर से वो पशोपेश में था
सच को फिर झुठलाना था
आँगन भर की जागीरदारी
वो भी तो एक ज़माना था
भूले हम सब प्यार के वादे
आखिर दिल को बहलाना था
"नज़र" की बातें कोई ना समझे
हाल-ए-दिल तो बतलाना था


3 Comments:
वाह !! इस प्यारी रचना जो सच से से सरोबार है, तारीफ के लिए अल्फाज नहीं हैं, बधाई हो !!!
इस नए ब्लॉग के साथ नए वर्ष में हिन्दी ब्लॉग जगत में आपका स्वागत है .. अच्छा लिखते हैं आप .. आपके और आपके परिवार वालों के लिए नववर्ष मंगलमय हो !!
हिंदी ब्लाग लेखन के लिये स्वागत और बधाई । अन्य ब्लागों को भी पढ़ें और अपनी बहुमूल्य टिप्पणियां देने का कष्ट करें
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