जब भी तू बेखबर सा लगे
कभी सहरा सा लगे कभी समन्दर सा लगे
मुझे अच्छा लगे जब भी तू बेखबर सा लगे
मै तेरी हर बात पर ही मोम सा पिघला हूँ
और तू है कि इस बुरे दौर में पत्थर सा लगे
मै बेबाक़ ऐसे ही चुभता हूँ पहले ही समझ ले
इससे पहले कि कोई लफ्ज़ तुझे नश्तर सा लगे
वो मेरे साथ है ये दुनिया समझती है मगर
मुझे तो ये फासला एक लम्बे सफ़र सा लगे
मुश्किलें शायद इतनी पड़ी कि आसां हो गयीं
हर रंज ओ ग़म तेरे चहरे पर बेअसर सा लगे
फितरतों के इस खेल को अब तक न समझा
"नज़र" को जो भी लगे बिलकुल नज़र सा लगे
Labels: जब भी तू बेखबर सा लगे


1 Comments:
good dear
Post a Comment
Subscribe to Post Comments [Atom]
<< Home