आज का दौर उग्रता से भरा हुआ है । विचारों का पूर्वाग्रह इतना शक्तिशाली हो गया है कि हम एक दूसरे के अस्तित्व को मिटाने पे तुले हैं | दिलचस्प बात तो ये है कि सभ्य होने का दंभ भरने वाले इस खेल में कहीं आगे हैं साफ़ सुथरे कपड़े पहन कर। हर दूसरा इंसान ऐसी प्रलय चाहता है जिसमे उसका या उसके हितों का कोई नुकसान न हो फिर चाहे समूची सृष्टि ही बह जाए, जल जाए या भांड में जाए। तकनीकी क्षेत्र में हम जितने आयामों के अविष्कार और उपयोग करते जा रहे हैं अपनी ज़िंदगी और दृष्टिकोण से उतने ही आयामों का ख़ात्मा। लोगों ने निडरता और निर्लज्ज्ता की ओट में एक डर बोना शुरू कर दिया है इस समाज में जिसकी फसल अगर पकी तो निश्चय ही आने वाली पीढ़ियों को मानसिक विकारों से भर देगी हममें से हरेक की ज़िम्मेदारी है भयमुक्त समाज की संरचना में हिस्सेदारी करना।


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