Monday, December 21, 2009

वो भी तो एक ज़माना था

अपना दिल भी दीवाना था
ख़्वाब को हमने सच माना था

उसका चेहरा एक हकीक़त
बाकी सब तो अफसाना था

अब समझे दुनिया का मतलब
रिश्तों का ताना बाना था

मेरा घर महफ़िल के सरीखा
छोड़ के सबको ही जाना था

भीड़ में रुसवा हमको किया
तन्हाई में समझाना था

उसका नाम भी ले ना पाए
होठों पर यूँ पैमाना था

फिर से वो पशोपेश में था
सच को फिर झुठलाना था

आँगन भर की जागीरदारी
वो भी तो एक ज़माना था

भूले हम सब प्यार के वादे
आखिर दिल को बहलाना था

"नज़र" की बातें कोई ना समझे
हाल-ए-दिल तो बतलाना था