Friday, August 26, 2016

वो समझना क्यों नहीं चाहते ?

ज्ञानी और समझदार होना , दोनों दो अलग अलग बातें हैं । समझदारी अनुभवों से निर्मित एक अवस्था है जिसमें उन्माद या आवेग कतिपय ही रहता है । ज्ञानी लोग इस बात को समझना क्यों नहीं चाहते ? क्योंकि "ज्ञानी और समझदार होना , दोनों दो अलग अलग बातें हैं ।"

हैरत की बात ये भी है

पलायन वेग के अच्छे जानकार भी कभी कभी आसमाँ में ठीक ऊपर की ओर थूक देते हैं !! जाने क्यों ??

हैरत की बात है

हैरत की बात ये भी है कुछ लोग पुरुषार्थ से परे अपने घर की महिलाओं को रेलवे टिकेट की खिड़की पे भेज देते हैं ताकि जल्दी से टिकेट मिल जाए । भले उनकी रेल गाड़ी १-२ घंटे बाद भी रवाना क्यों न होने वाली हो । उस वक़्त वक़्त उनके चहरे पे शर्मिंदगी और उपलब्धि दोनों का मिला जुला परन्तु अद्भुत भाव होता है । इधर हम लाइन में खड़े सोचते हैं कि"जाएँ चपलिया दें क्या ???"

Sunday, May 1, 2016

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Tuesday, March 11, 2014

हम निंदा करते हैं !!

उदारीकरण की नीतियाँ हमेशा सुखद नहीं होतीं। कठोर फैसले लेने नितांत आवश्यक हैं और उनकी आवश्यकता तब और बढ़ जाती है जब मुद्दा राष्ट्र की सम्प्रभुता और अखंडता को सजोने का हो। कम्युनिस्ट इस राष्ट्र की नीतियों से खुश नहीं हैं, आतंकवाद इस देश की धर्मनिरपेक्षता से, कुछ लोग इसकी सीमा रेखा से खुश नहीं हैं और कुछ को तो संविधान में ही विश्वास नही है । तो क्या राष्ट्र तुष्टिकरण की नीति पे चले और सबकी नाराज़गी और घृणा को स्थान देके के फ़ैसला ले। राष्ट्र विरोधी घटनाओं की भर्त्सना ही एक मात्र विकल्प क्यों दिखता है हमें या हमारे राष्ट्र के नुमाइंदों को और उसमे से भी कुछ तो खुल के विरोध भी नहीं कर पाते। निंदा करते रहिये और थोपते रहिये आक्षेप दूसरे पर परन्तु ये असहनीय है की आप की स्वतंत्रता और स्वछ्न्दता की क़ीमत हर बार कुछ लोग ही चुकाएँ और वो भी अपने प्राण देकर । रात को बियर के चुस्की , मल्टीप्लेक्स थिएटरों में पॉपकॉर्न के साथ फिल्मों का आनंद, रेस्त्रा में पिज़्ज़ा और बर्गर के स्वादिष्ट टुकड़ों, टीवी के स्वयंवरों और निज़ी सम्बन्धों की ऐच्छिक सार्वजनिक छीछा -लेदर का सुलभ दर्शन आपको सौगात में नहीं मिलें है। दूर कहीं उसकी एक बड़ी कीमत चुका रहे हैं हमारे अपने ही लोग


जन मानस के एक वर्ग को तो फर्क नहीं पड़ता क्योंकि उनके नज़रिये काल्पनिकता से ओत - प्रोत है जिसमे विडियो गेम का एक हीरो सारी समस्याओं को हल कर देता हैं और उस मानसिकता में रिसेट का विकल्प हमेशा रहा है


फर्क हमें पड़ता है क्योंकि हमें इतिहास पढ़ाया गया है प्राथमिक विद्यालयों में जिसमें अनगिनत हीरो थे, सदियों का संघर्ष था और रिसेट का कोई विकल्प नहीं।


हमें विकसित राष्ट्र के लिए एक निरंतर विकासशील नज़रिया चाहिए जिसमे सही को सही और ग़लत को ग़लत कहके उसे दण्डित करने की शक्ति हो।वर्ना मुद्दे मूल्य मांगते मांगते कहीं हर दरवाज़े पे न आ जाए , स्थिति और भयावह हो जायेगी क्योंकि इस देश का हर नागरिक आज सैनिक नहीं रहा ।

जय हिन्द

-- आलोक उपाध्याय --

सदियों तक ग़ुलामी झेलता इस देश का अदना सा बेचारा इंसान। राजशाही व्यवस्था में राजा सरकार था और उसके मंत्री -सामंत आम लोगों के माई बाप। कुछ बुद्धजीवी लोग , बहादुर लोग लड़े और इस व्यवस्था परिवर्तन में अपना विश्वास जताते हुए योगदान दिया तमाम संघर्षो के बाद २६ नवंबर १९४९ को हमें, हमारे लिए ,हमारे तरीके से जीने की व्यवस्था मिली जिसका स्वरुप था लोक तन्त्र। इस देश के अदना से बेचारे इंसान को ये मालूम हुआ कि देश आज़ाद हुआ है पर अफ़सोस उसे ये सन्देश नहीं मिला कि वो भी आज़ाद हुआ है क्योंकि ये सन्देश लिखित रूप में था और किताबों में ज़ब्त(भारतीय संविधान) और उस बेचारे इंसान की साक्षरता दर लगभग 18.33%(in 1951) थी। कहाँ पढ़ पाता अपने अधिकार और कहाँ निभा पाता अपने लिखित कर्त्तव्य।
देश आज़ाद हुआ वो अदना सा, अनपढ़, गरीब, बेचारा इंसान नहीं। । हाँ बस माई-बाप बदल गए.

आज का दौर उग्रता से भरा हुआ है । विचारों का पूर्वाग्रह इतना शक्तिशाली हो गया है कि हम एक दूसरे के अस्तित्व को मिटाने पे तुले हैं | दिलचस्प बात तो ये है कि सभ्य होने का दंभ भरने वाले इस खेल में कहीं आगे हैं साफ़ सुथरे कपड़े पहन कर। हर दूसरा इंसान ऐसी प्रलय चाहता है जिसमे उसका या उसके हितों का कोई नुकसान न हो फिर चाहे समूची सृष्टि ही बह जाए, जल जाए या भांड में जाए। तकनीकी क्षेत्र में हम जितने आयामों के अविष्कार और उपयोग करते जा रहे हैं अपनी ज़िंदगी और दृष्टिकोण से उतने ही आयामों का ख़ात्मा। लोगों ने निडरता और निर्लज्ज्ता की ओट में एक डर बोना शुरू कर दिया है इस समाज में जिसकी फसल अगर पकी तो निश्चय ही आने वाली पीढ़ियों को मानसिक विकारों से भर देगी हममें से हरेक की ज़िम्मेदारी है भयमुक्त समाज की संरचना में हिस्सेदारी करना।

चार वर्षों के बाद ब्लॉग पे वापसी करते हुए बहुत अलग महसूस कर रहा हूँ। .

Thursday, January 14, 2010

जब भी तू बेखबर सा लगे

कभी सहरा सा लगे कभी समन्दर सा लगे
मुझे अच्छा लगे जब भी तू बेखबर सा लगे

मै तेरी हर बात पर ही मोम सा पिघला हूँ
और तू है कि इस बुरे दौर में पत्थर सा लगे

मै बेबाक़ ऐसे ही चुभता हूँ पहले ही समझ ले
इससे पहले कि कोई लफ्ज़ तुझे नश्तर सा लगे

वो मेरे साथ है ये दुनिया समझती है मगर
मुझे तो ये फासला एक लम्बे सफ़र सा लगे

मुश्किलें शायद इतनी पड़ी कि आसां हो गयीं
हर रंज ओ ग़म तेरे चहरे पर बेअसर सा लगे

फितरतों के इस खेल को अब तक न समझा
"नज़र" को जो भी लगे बिलकुल नज़र सा लगे

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Monday, December 21, 2009

वो भी तो एक ज़माना था

अपना दिल भी दीवाना था
ख़्वाब को हमने सच माना था

उसका चेहरा एक हकीक़त
बाकी सब तो अफसाना था

अब समझे दुनिया का मतलब
रिश्तों का ताना बाना था

मेरा घर महफ़िल के सरीखा
छोड़ के सबको ही जाना था

भीड़ में रुसवा हमको किया
तन्हाई में समझाना था

उसका नाम भी ले ना पाए
होठों पर यूँ पैमाना था

फिर से वो पशोपेश में था
सच को फिर झुठलाना था

आँगन भर की जागीरदारी
वो भी तो एक ज़माना था

भूले हम सब प्यार के वादे
आखिर दिल को बहलाना था

"नज़र" की बातें कोई ना समझे
हाल-ए-दिल तो बतलाना था

Monday, September 7, 2009

रिश्ते और बेहतर हो सकते हैं

ये आंसुओ से तर हो सकते हैं
रिश्ते और बेहतर हो सकते हैं

चंद सांसे अभी भी बाकी हैं
मेरे नुख्से कारगर हो सकते हैं

हमें अब तक यकीं नहीं आया
वो भी सितमगर हो सकते हैं

ये वक़्त का एक फलसफा है
फूल भी पत्थर हो सकते हैं

नुकसान की तो बात न करो
ये जनाब जानवर हो सकते हैं

दरख्त सूखने लगे अचानक
कई परिंदे बेघर हो सकते हैं

इस तरह मुलाक़ात की उसने
ये चर्चे उम्र भर हो सकते हैं

अपने घर में कभी न सोचा
हम भी बेक़दर हो सकते हैं

बात यकीं पे आके रुकती है
सायेबां सूखे शजर हो सकते हैं

कैफ़ियत यूँ ठीक नहीं अपनी
तीर-ए-नज़र बेअसर हो सकते हैं